'अच्छी बहू' की बहस की इस सीरीज का समापन आज हम परिवार में अपने रोल को लेकर पुरुषों के विचारों से और न्यूक्लियर परिवार की जरूरत पर वे क्या सोचते हैं, इसी से कर रहे हैं। पाठकों ने जिस तरह बढ़-चढ़कर इस बहस में हिस्सा लिया उसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। यकीनन बदलते वक्त के साथ हमें महिलाओं को अच्छी बहू की कसौटी से आजाद करना होगा और इसे लेकर परिवार-समाज में बहस जारी रहनी चाहिए:
अक्सर महिलाओं पर यह इल्जाम लगाया जाता है कि घर से अलग होने की उतावली उन्हें ज्यादा रहती है। सच तो यह है कि एक वक्त के बाद पुरुष भी न्यूक्लियर फैमिली का ही विकल्प चाहते हैं। कारण कि संयुक्त परिवार में उनकी आय और संपत्ति का वितरण योग्यता और परिश्रम के मुताबिक नहीं होता। फर्जों और दायित्वों के नाम पर उनसे सारी आर्थिक जिम्मेदारियों को ढोने की उम्मीद करते हैं, तिस पर उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की उपेक्षा होती है। सामूहिकता के नाम पर एक ही लकड़ी से सबको हांकने की कोशिश होती है।
उनकी पत्नियों को यथोचित सम्मान और स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। बड़े-बूढ़ों के लिहाज के नाम पर उन्हें दबे-सहमे रहना पड़ता है। लोग कहते हैं कि अक्सर शादी के बाद पति की स्थिति घरवालों और बीवी की उम्मीदों के कारण सैंडविच सी हो जाती है। हालांकि इसके लिए पति भी कम दोषी नहीं है। दोनों पक्षों को नाराज नहीं करने के चक्कर में उनसे झूठी अपेक्षाएं करता है। वह दोनों को सच्चाइयों से अवगत नहीं करवाता। दोनों पक्षों को खुश रखने की कोशिश में 'न' कहने से बचता है।
अक्सर महिलाओं पर यह इल्जाम लगाया जाता है कि घर से अलग होने की उतावली उन्हें ज्यादा रहती है। सच तो यह है कि एक वक्त के बाद पुरुष भी न्यूक्लियर फैमिली का ही विकल्प चाहते हैं। कारण कि संयुक्त परिवार में उनकी आय और संपत्ति का वितरण योग्यता और परिश्रम के मुताबिक नहीं होता। फर्जों और दायित्वों के नाम पर उनसे सारी आर्थिक जिम्मेदारियों को ढोने की उम्मीद करते हैं, तिस पर उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की उपेक्षा होती है। सामूहिकता के नाम पर एक ही लकड़ी से सबको हांकने की कोशिश होती है।
उनकी पत्नियों को यथोचित सम्मान और स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। बड़े-बूढ़ों के लिहाज के नाम पर उन्हें दबे-सहमे रहना पड़ता है। लोग कहते हैं कि अक्सर शादी के बाद पति की स्थिति घरवालों और बीवी की उम्मीदों के कारण सैंडविच सी हो जाती है। हालांकि इसके लिए पति भी कम दोषी नहीं है। दोनों पक्षों को नाराज नहीं करने के चक्कर में उनसे झूठी अपेक्षाएं करता है। वह दोनों को सच्चाइयों से अवगत नहीं करवाता। दोनों पक्षों को खुश रखने की कोशिश में 'न' कहने से बचता है।
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