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काबिल इंसान बनना ज्यादा जरूरी है

मैं एक नौकरीपेशा युवती हूं। शादी नहीं हुई है मगर दफ्तर के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां बखूबी संभालती हूं। मेरे घर में भैया-भाभी और ममी-पापा भी हैं। भाभी की बेटी भी है और ऑफिस भी जाती है। दोनों मोर्चों को संभालना उनके लिए ज्यादा हो जाता है इसलिए मैं घर के, खासकर किचन के काम में भरसक मदद करती हूं। जैसे ऑफिस जाने से पहले नाश्ता बना देना और शाम को ऑफिस आने के बाद डिनर तैयार करना। लंच ममी बना देती हैं, लेकिन किचन में हर समय हाजिरी देना उनके लिए जरूरी नहीं होता। बेशक, हम उन्हें पूरा सपोर्ट दे रहे हैं मगर इसका यह मतलब नहीं कि हर घर के हालत इसी तरह ठीक हों।

जैसे, मेरी दीदी का मामला लें। दीदी भी वर्किंग हैं। उनकी शादी को तीन साल हुए हैं। उनकी भी एक बेटी है। घर को अच्छी तरह से संभालने की वह हर कोशिश करती हैं ताकि सब खुश रहें। उन्होंने लव मैरिज की थी और जॉइंट फैमिली में रह रही हैं। उनसे बात होती है तो मालूम पड़ता है कि रसोई संभालना उनके लिए कितना बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। उनके घर में खाने के मामले में घर में हर शख्स अपनी पसंद चाहता है। स्वाद में जरा सी ऊंच-नीच किसी को पसंद नहीं।

एक दिन की बात है। दीदी ने सबकी पसंद का गाजर का हलवा बनाया। यूं तो उसमें सब कुछ उसी तरह मिलाया गया था जैसे कि सासू जी को अच्छा लगता था लेकिन उसके बाद भी उसमें न सिर्फ सासू जी ने बल्कि बाकी घरवालों ने भी इतनी कमियां निकालीं कि उन्हें अपनी मेहनत पर अफसोस हुआ। उन्होंने हम से कहा- शायद इतना सब मुझे इसलिए सुनना पड़ा कि वो हलवा मैंने बनाया था और सबको मां जी के हाथ का बना पसंद था। चुप कर गई, कुछ न बोल पाई।

दीदी की यह एक दिन की समस्या नहीं थी। सब को खुश रखने की हर कोशिश कर लेती, तब भी कमियों को लेकर टोका-टोकी की जाती। कभी दाल में लगाए गए तड़के पर सवाल तो कभी भोजन की खुशबू पर, स्वाद नहीं आ रहा या कभी यूं ही कह दिया कि मजा नहीं आ रहा। नाश्ते में सबकी अलग-अलग फरमाइश, ननद को सैंडविच चाहिए तो देवर को परांठा, सास-ससुर को सादी रोटी-सब्जी चाहिए तो पति को पोहा। कहती हैं डर लगता है कि मैं रोबॉट बनकर न रह जाऊं।
खाने में छोटी-छोटी मीन मेख निकालकर किचन पॉलिटिक्स करना कितना सही है? कॉमेंट कर हमें बताएं...
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आखिर बहू भी तो किसी की बेटी है

सास-बहू के रिश्ते की बात ही कुछ ऐसी है कि दोनों को साथ बैठा दो तो एक की बात पर दूसरा असहज दिखाई पड़ता है और नजरें न भी मिलें पर बातों का निशाना एक-दूसरे पर ही होता है। ऐसा ही एक मौका तब आया जब जल्द शुरू होने जा रहे सीरियल 'आखिर बहू भी तो बेटी ही है' की लीड कास्ट सास नौलखा देवी का किरदार निभा रहीं प्राची पाठक और बहू सिया बनीं पायल राजपूत से बातचीत हुई। नौलखा जहां कड़क सास हैं वहीं सिया सरल मगर मजबूत इरादों वाली लड़की है। इस धारावाहिक में बहू को भी बेटी जैसा मानने और सास को भी मां जैसा मानने की बात कही गई है। आइए सुनते हैं सास-बहू के इस रिश्ते पर इनका क्या कहना है?


रील लाइफ में... अच्छी बहू कौन है? नौलखा देवी - वो जो सुबह जल्दी उठकर, नहा धोकर सभी को बिस्तर पर चाय देकर जगाए, बच्चों की बढ़िया से देखभाल, पढ़ाई-लिखाई करवाए, जबान न चलाए, बड़ों के सामने नजर न उठाए। सिया - बहू भी इंसान है। उसकी भी लाइफ होती है। उसे भी स्पेस मिलना चाहिए। इतने मच्योर सभी होते हैं कि खुद से समझें कि बड़ों के सामने कैसे पेश आना है।

खाना अच्छा नहीं बना तो? नौलखा - फेंक दूंगी। सिया - सास को साथ खड़ा करके दोबारा खाना बनाऊंगी।

बहू को सहेली ने नाइट पार्टी के लिए बुलाया है? नौलखा - न्योता देना है तो पूरे परिवार को दें, बहू को अकेले नहीं जाने दूंगी। सिया - सास को प्यार से समझाऊंगी और मनाने की कोशिश करूंगी।

बेटे ने बीवी की पैरवी की तो? नौलखा - बहू के बारे में बेटे को कुछ नहीं कहने दूंगी।

क्या बहू को बेटी और सास को मां समझना मुश्किल है? नौलखा - बहू घर की बहू है और उसे डिसिप्लिन में रहना ही होगा। सिया - मैं सास या मां और मायके या ससुराल में बहुत फर्क नहीं करती।

रीयल लाइफ में... रीयल लाइफ में प्राची जहां शादीशुदा हैं वहीं पायल बैचलर हैं। किरदार से हटकर असल जिंदगी में वो सास-बहू के रिश्ते या पार्टनर के साथ बराबरी पर क्या सोचती हैं, आइए जानें :

सीरियल में बहू को हर काम में परफेक्ट होने की नसीहत देने वाली नौलखा देवी उर्फ प्राची पाठक असल जिंदगी में कभी किचन में काम करने नहीं गईं। वह बताती हैं, 10-12 साल के अफेयर के बाद हमने शादी की थी। शुरू से ही मेरी पसंद-नापसंद सभी को पता थी। मुझे किचन का काम बिल्कुल पसंद नहीं। हां, घर को सजाने, साफ-सफाई में मेरी बड़ी रुचि है जिसे मैं बड़े चाव से करती हूं। मुंबई में सास के साथ शॉर्ट्स में घूमती हूं मगर ससुराल जो कि छोटा शहर है, वहां पर सूट ही पहनती हूं और सिर पर चुनरी रखती हूं। मेरा सास-ननद सभी से दोस्ताना रिश्ता है, मगर इसे ऐसा बनाने के लिए मैंने अपनी तरह से भरपूर कोशिश की है। मैं कभी सास पर खर्च करने से नहीं झिझकती। उनपर अपनी मां जैसा ही खर्च करती हूं। उन्हें जो पसंद होता है, शॉपिंग की पूरी लिस्ट मैं खरीदवाती हूं। वहीं ननदों के लिए भी आलमारी खोल देती हूं। इसी तरह ननद पेंटिंग बनाती है और अगर मुझे पसंद आ गई तो उसे घर ले आती हूं। वहीं मेरे पति मुझे मेरे काम के लिए पूरी तरह फ्री रखते हैं। मेरे बाकी काम वो संभालते हैं और पूरा सपोर्ट देते हैं। मुझे लगता है कहीं न कहीं परवरिश का असर पड़ता है। लड़कियों की परवरिश पैरंट्स को बहुत ब्रॉड माइंड के साथ करनी चाहिए और अगर ऐसा नहीं करते तो दिक्कतें आएंगी।

सिया का किरदार निभा रहीं पायल बताती हैं कि मुझे कुकिंग का शौक है और मैं चाहूंगी कि जब पांच साल बाद मेरी शादी हो तो मेरे पति घर पर सारी जिम्मेदारियां मेरे साथ बांटें। वो सब्जी काटें और मैं खाना बनाऊं। मैं बाहर काम करूंगी तो चाहूंगी कि घर की टेंशन से काफी हद तक फ्री रहूं। हां, कई लोग शिकायत करते हैं कि जिंदगी कट गई और ससुराल वालों को खुश नहीं कर पाई। मैं बस इतना कहना चाहूंगी कि बहू को शुरुआत से ही कुछ चीजों का ध्यान रखना चाहिए जैसे कि परिवार के सदस्यों के साथ कम्युनिकेशन गैप न बनने दे, सभी के साथ कंफर्टेबल रहे और दूसरों को भी ऐसा महसूस कराए। सास के सामने अपनी बात रखें और अगर वो नहीं सुनतीं तो एक नहीं दो नहीं ग्यारहवीं बार तो वो आपकी सुन ही लेंगी। मेरा तरीका एक ही है प्यार से समझाओ। मैं उनका हाथ पकड़कर पूछ सकती हूं कि आप मान जाइए ना। हमें परिवार में सभी से शुरू से ही मिलना-जुलना रखना चाहिए वरना उम्र निकल जाएगी और कोई खुश नहीं होगा हमसे। 
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घर के कामों में बराबर हाथ बंटाए पति

पत्नी के अच्छी बहू बनने के चक्कर में पति भी पिसता है। शादी के बाद पत्नी का अधिकार उस पर होता है और मां अचानक अधिकार उस पर से छोड़ नहीं पाती। ऐसे में दोनों को लड़के की स्थिति समझनी चाहिए। - संजय अवस्थी

अच्छी बहू का मतलब अगर ये है कि बहू पति की हर बात माने, सास की जली-कटी सुने, गाय बनकर रहे, कमाए भी और घर का सारा काम भी करे, घर से दहेज भी लाए तो माफ करना ऐसा कतई मुमकिन नहीं है। - श्रेया जैन

घर में किसी को किसी से ज्यादा की आशा नहीं करनी चाहिए। ज्यादा आशा लगाने से निराशा मिलती है। बेटा मां और पत्नी दोनों से बिगाड़ नहीं सकता। - जीवन कुमार मित्तल

मां या बीवी का साथ देना है, यह तय करने से पहले पति यह देखे कि गलती किसकी है। लोगों के माइंड में है कि मुझे मां का ही साथ देना है। ऐसे लोगों से अपील है कि मेरे भाइयों तुम्हारी मां का ख्याल रखने के लिए तुम्हारे पापा, भाई-बहन सब हैं मगर तुम्हारे पत्नी सिर्फ तुम्हारे भरोसे इस घर में आई है। - अरविंद

पति को चाहिए कि वो पैरंट्स और पत्नी में बैलेंस बनाए। पत्नी की जरूरतें भी समझे। उसकी पसंद भी जाने। - अंजलि चड‌्ढा

आज जो हालात हैं उन्हें पति ही सुधार सकता है। पर वो ऐसा क्यों करे? जब उसके बिना कुछ किए बहू घर में निभा ही रही है। मां-दादी से मिले प्यार के वे आदी हो जाते हैं और पत्नी की मदद के बजाय उससे भी बस प्यार की ही उम्मीद करते हैं। वैसे उन्हें इसी मानसिकता के साथ बड़ा किया जाता है कि स्त्री हमेशा दोयम दर्जे की है। यही वजह है कि वे अपनी मां को भी उसका जायज स्थान नहीं देते। न वो मां का साथ देते हैं और न पत्नी का। बस खुद को बेचारा बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। अगर हर मां अपने बेटे को बचपन से स्त्रियों का सम्मान करना सिखाए, लाड-प्यार की आदत न डाले, उनके काम करने के बजाय उनसे करवाए, उन्हें स्ट्रॉन्ग बनाए तो शायद आने वाले समय में परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है। - सुनीता छंगानी

पत्नी पति के रिश्ते के बंधन के कारण ही ससुराल में हर रिश्ते से तालमेल बैठाने का प्रयास करती है, इसलिए पति की सबसे अधिक जिम्मेदारी है कि पत्नी का तालमेल परिवार के साथ और स्वयं के साथ बैठाने में ईमानदारी बरते। परिवार की गलती पर खामोश रहकर वह उनको सुरक्षा प्रदान करता है। यदि पत्नी के अपमान, दर्द से पति को कोई वास्ता नहीं तो ये कैसा रिश्ता, कैसा प्यार है जिसको निभाते हुए पत्नी अग्निपरीक्षा देती रहे। - विजयलक्ष्मी

मेरी शादी को एक साल होने को है। घर में पापा, मैं और एक 10 साल छोटा भाई। पर मेरी पत्नी से इतने लोगों में भी अडजस्टमेंट नहीं हो पाता। कुछ उसकी भलाई के लिए कहूंगा जैसे दवाई टाइम पर खाना, खाना ज्यादा खाया कर उसे लगता है कि मैं उससे लड़ रहा हूं। उसकी मम्मी उसे कुछ भी कहे बुरा नहीं मानती मगर मेरे पापा कुछ अच्छा भी कहें तो बुरा मान जाती है। - सागर सिंह

जो वित्तीय रूप से मजबूत है और समझदार है वो तो पहले ही न्यूक्लियर फैमिली बना देते हैं। जो नहीं करते वे ऐसे ही घुटते रहते हैं। बेटा तो दो कपाट के बीच में पिसता है। - के़ डी़ अग्रवाल
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मर्द भी चाहते हैं न्यूक्लियर फैमिली

'अच्छी बहू' की बहस की इस सीरीज का समापन आज हम परिवार में अपने रोल को लेकर पुरुषों के विचारों से और न्यूक्लियर परिवार की जरूरत पर वे क्या सोचते हैं, इसी से कर रहे हैं। पाठकों ने जिस तरह बढ़-चढ़कर इस बहस में हिस्सा लिया उसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। यकीनन बदलते वक्त के साथ हमें महिलाओं को अच्छी बहू की कसौटी से आजाद करना होगा और इसे लेकर परिवार-समाज में बहस जारी रहनी चाहिए:


अक्सर महिलाओं पर यह इल्जाम लगाया जाता है कि घर से अलग होने की उतावली उन्हें ज्यादा रहती है। सच तो यह है कि एक वक्त के बाद पुरुष भी न्यूक्लियर फैमिली का ही विकल्प चाहते हैं। कारण कि संयुक्त परिवार में उनकी आय और संपत्ति का वितरण योग्यता और परिश्रम के मुताबिक नहीं होता। फर्जों और दायित्वों के नाम पर उनसे सारी आर्थिक जिम्मेदारियों को ढोने की उम्मीद करते हैं, तिस पर उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की उपेक्षा होती है। सामूहिकता के नाम पर एक ही लकड़ी से सबको हांकने की कोशिश होती है।

उनकी पत्नियों को यथोचित सम्मान और स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। बड़े-बूढ़ों के लिहाज के नाम पर उन्हें दबे-सहमे रहना पड़ता है। लोग कहते हैं कि अक्सर शादी के बाद पति की स्थिति घरवालों और बीवी की उम्मीदों के कारण सैंडविच सी हो जाती है। हालांकि इसके लिए पति भी कम दोषी नहीं है। दोनों पक्षों को नाराज नहीं करने के चक्कर में उनसे झूठी अपेक्षाएं करता है। वह दोनों को सच्चाइयों से अवगत नहीं करवाता। दोनों पक्षों को खुश रखने की कोशिश में 'न' कहने से बचता है।
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महज नारा बन कर न रह जाए नारी समानता

इसी हफ्ते फोर्ब्स द्वारा जारी सालाना अरबपतियों की लिस्ट में महिलाओं का दबदबा देखने को मिला। इस बार 172 महिलाओं ने फोर्ब्स की लिस्ट में जगह बनाई, जो अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। पिछले साल के मुकाबले इस साल महिलाओं की संख्या में 25 फीसदी का इजाफा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर अपनी मेहनत और समर्पण से दुनिया की इस आधी आबादी ने पुरुष प्रधान व्यवस्था में अपनी जो एक हैसियत कायम की है, वह एक मिसाल है। आज और बीते दिनों पर नजर डालें तो यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि जहां-जहां और जब-जब भी मौका मिला, महिलाओं ने यह साबित कर दिखाया कि वे किसी से कम नहीं। चाहे फिर वह वैदिक काल की विदुषी गार्गी और मैत्रेयी हों, बुद्ध के शांति संदेशों को विदेशी सरजमीं पर फैलाने वाली संघमित्रा हों, मध्यकाल की रजिया सुल्तान हों या फिर भारत की स्वतंत्रता के लिए वीरता के नए मानदंड गढ़ने वाली झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, मैडम कामा, सरोजिनी नायडू, विजयालक्ष्मी पंडित जैसे दर्जनों-सैकड़ों नाम।

महज नारा बन कर न रह जाए नारी समानता
अगर हम आज और निकट अतीत में ही थोड़ा झांकने की फुरसत निकालें तो जुबान पर बरबस इंदिरा गांधी, मार्ग्रेट थैचर, बेमिसाल बेनजीर भुट्टो, शेख हसीना के नाम आ जाते हैं। पीटी उषा, अश्विनी नचप्पा, साइना नेहवाल और सानिया मिर्जा के खेल पर खड़े होकर तालियां पीटते लाखों-करोड़ों लोगों के हुजूम का भी एक अक्स उभर आता है। लेकिन, हर वर्ष आठ मार्च को महिला दिवस पर आसपास नजर घुमाते हैं तो विडंबनाओं से भरी कचोटने और कई सवाल खड़े करने वाली एक अलग तस्वीर भी सामने आती है। इस कड़वे सच को नहीं झुठलाया जा सकता है कि आज महिलाएं जहां एक ओर अपनी योग्यता, पराक्रम और उद्यमशीलता से रोज नए प्रतिमान बना रही हैं, वहीं बहुसंख्यक महिलाएं शोषण, अत्याचार और हिंसा का शिकार हैं। महिलाएं कौतुक और विस्मय का विषय बन गई हैं और उसकी सुघड़ता, कुशलता, प्रखरता एवं योग्यता के बदले उसके रंग-रूप, यौवन, आकार, उभार और ऊंचाई की मानसिकता हावी हो गई है।

इस कुत्सित मानसिकता का भयावह दुष्परिणाम आज हमारे समने बलात्कार, अत्याचार, कन्या भ्रूण हत्याएं एवं नारी हिंसा के रूप में है। आप तनिक इन आंकड़ों पर गौर कीजिए, आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे और आपको सामाजिक मूढ़ता और प्रशासनिक शिथिलता पर शर्म आएगी और एक मार्मिक चीख निकल आएगी। 2012 के बलात्कार आंकड़ें 2011 के मुकाबले 24 प्रतिशत ज़्यादा हैं। एनसीआरबी के 1953 से लेकर 2011 तक के अपराध के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1971 के बाद से देश में बलात्कार की घटनाएं 873.3 फीसदी तक बढ़ी हैं। इसके अलावा उन मामलों की फेरहिस्त भी काफी लंबी है जिनकी शिकायत थाने तक पहुंचने ही नहीं या पहुंचने ही नहीं दी गई..! बलात्कार के मामलों में 40 साल में करीब 800 फीसदी तक का इजाफा हैरान करने वाला है। देश की विभिन्न अदालतों में बलात्कार एवं यौन अपराध से जुड़े 24,117 मामले लंबित है जिसमें सबसे अधिक 8215 मामले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में हैं। स्वयं कानून मंत्री ने भी माना है कि 30 सितंबर 2012 तक देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में बलात्कार से जुड़े 23,792 और उच्चतम न्यायालय में 325 मामले लंबित है।  


महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए चीखते इन प्रश्नों से कदम-कदम पर हमारा सामना होता है। लेकिन सामाजिक बेशर्मी और प्रशासनिक शिथिलता के कारण इसके उत्तर लापता हैं। क्या हमें बार-बार बलात्कार की घटना हो जाने के बाद प्रतिवावद और आंदोलन की जरूरत है? 16 दिसंबर 2012 को निर्भया बलात्कार कांड के बाद क्या गुबारों का बारूद नहीं फट पड़ा था? लेकिन, देश और दुनिया को दहलाकर रख देने वाली उस घटना के बाद क्या यौन हिंसा रुक गई? नहीं। हम सभी जानते हैं कि हाल ही में एक वरिष्ठ पत्रकार पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगे और मामला अभी कार्ट में विचाराधीन है।

यह कोई अकेला आरोप नहीं है। ऐसे कई मामले हैं। गुड़गांव की एक कंपनी में सुकन्या (बदला हुआ नाम) के साथ दुष्कर्म का मामला भी कोर्ट के विचाराधीन है। 25 अक्टूबर, 2013 को एवन हेविट प्रा. लि. के दो प्रबंध निदेशकों ने अपने गुड़गांव ऑफिस में सुकन्या (बदला हुआ नाम) के साथ बलात्कार किया। वह इन दरिंदों का शिकार केवल इस कारण से हुई कि वह एक साधारण परिवार की थी और ये दरिंदे उसे नौकरी और करियर की धमकी देते थे। इन लोगों ने ऐसा जाल बुना था कि वह उससे निकल नहीं पा रही थी। खास बात ये कि उसे उसके ही सीनियर पूजा ने उसे नोएडा से गुड़गांव ऑफिस में शिफ्ट किया था। सुकन्या ने बार बार पूजा से गुजारिश की थी कि वहां और लड़कियों के तबादले किए जाएं ताकि माहौल सुरक्षित रह सके। अंत में लगातार दुष्कर्म से परेशान सुकन्या को नौकरी छोड़नी पड़ी।

सुकन्या के मामले में खास बात ये थी कि उस कंपनी में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ विशाखा दिशा-निर्देश नहीं लगा था जो करना सभी कार्यालयों में कोर्ट ने अनिवार्य कर दिया है। इस दिशा-निर्देश में न केवल कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न पर रोक के प्रावधान हैं, बल्कि ऐसे मामलों में जांच के भी समुचित प्रवाधान व प्रक्रियाओं के उल्लेख हैं। इस तरह की लापरवाही को कैसे माफ किया जा सकता है। यह कोर्ट के दिशा निर्देश का भी उल्लंघन है। इस मामले को उठाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील किसलय पांडेय बताते हैं कि दुष्कर्म को रोकने और ऐसे मामलों से निपटने के लिए अनेक कानूनों के बावजूद दिल्ली पुलिस अक्षम साबित होती रही है। यदि पीड़िता असहाय है तो उसे कभी न्याय नहीं मिल पाएगा।

बदलते हुए वक्त की आवाज सरकार तक भी पहुंची है। अभी इसी सप्ताह बलात्कार पीड़ितों की मानसिक पीड़ा को समझते हुए सरकार ने इलाज और जांच के लिए नई गाइडलाइन जारी की है। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने 'टू फिंगर' टेस्ट पर रोक लगा दी है। नए दिशा-निर्देश के अनुसार इसे अवैज्ञानिक और गैर-कानूनी करार दिया गया है। अस्पतालों से कहा गया है कि वे पीड़ितों की फॉरेंसिक और मेडिकल जांच के लिए अलग से कमरे की व्यवस्था करें।

अब तक बलात्कार पीड़ितों की जांच केवल पुलिस के कहने पर की जाती थी, लेकिन अब यदि पीड़ित पहले अस्पताल आती है तो एफआईआर के बिना भी डॉक्टरों को उसकी जांच करनी चाहिए। डॉक्टरों से 'रेप' शब्द का इस्तेमाल नहीं करने को कहा गया है, क्योंकि यह मेडिकल नहीं कानूनी टर्म है। अस्पतालों को रेप केस में मेडिको-लीगल मामलों (एमएलसी) के लिए अलग से कमरा मुहैया कराना होगा और उनके पास गाइड लाइंस में बताए गए आवश्यक उपकरण होना जरूरी है। पीड़ित को वैकल्पिक कपड़े उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए और जांच के वक्त डॉक्टर के अलावा तीसरा व्यक्ति कमरे में नहीं होना चाहिए। यदि डॉक्टर पुरुष है तो एक महिला का होना आवश्यक है।

कानून भी बने और उपाय भी किए गए। लेकिन फिर भी कुछ सवाल अभी भी जवाब ढूंढ रहे हैं। मसलन, भारत को महिलाओं के लिए सुरक्षित कैसे बनाया जाए? भारतीय महिलाओं को सही मायनों में सशक्त बनाने के लिए उसे पूरी आर्थिक स्वतंत्रता, दैहिक स्वतंत्रता व निर्णय लेने की स्वतंत्रता कब मिलेगी? घरेलू हिंसा के लिए मुख्य रूप से कौन जिम्मेदार है? स्त्री कब तक महज एक देह मानी जाती रहेगी? क्या बदलते दौर में आने वाली पीढ़ी के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान को कैसे बढ़ाया जाए?

इन सवालों के जवाब में ही महिला सशक्तिकरण का कालजयी नुस्खा छिपा है। आइए हम आज से ही इस महान बदलाव के शुरुआत की शपथ लें। माताएं अपने बेटे और बेटियों की परवरिश में अंतर करना छोड़ दें। घर में पिता-पत्नी और बेटी का, और बेटा-मां और बहन का सम्मान करें। बाहर किसी भी स्त्री को कोई भी पुरुष इंसान की तरह मान कर सम्मान करें। साथ ही स्त्रियां भी स्त्री होने का गलत और बेजा उपयोग न करें। अगर हम अपने घर से ही इसकी शुरुआत करते हैं तो हम बदलेंगे, समाज बदलेगा और युग बदलेगा। तभी उस आधी आबादी को, जिसकी आंखों पर शायरों ने लाजवाब नज्म लिखे और जिसके शौर्य और पराक्रम पर कवियों ने वीर रस की ओजपूर्ण कविताएं लिखीं, उन्हें वो हक मिलेगा जिसकी वो हकदार हैं। अब और वक्त नहीं है हमारे पास। अगर इन लम्हों में हमसे कोई खता हुई तो आने वाली सदियों को भुगतना होगा।
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